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Wednesday, April 25, 2012

Thanks for being in my Life

Thank you all.
I am happy that my existence make you Happy,
I am thankful to you all, who come into my life,
touched me, my emotions, ideas and all,
that the nature sent you to affect my life,
and in the process you achieved me,
for whatever I am. I send you love 
as a part of me lives in you 
and
a part of you lives in me,
hoping that we all work coherent,
so that all the nature get imbibed in us
and a part of us will leave a mark in the nature,
and a positive note on the instrument will ring 
like somebody touches the veena strings.

Tuesday, August 23, 2011

अन्ना के हुजूम के लिए

देश में देखकर हुंकार,
स्वच्छन्द हो गया मैं कर पुकार,
उठते विकारो से द्वंद हो गया,
उस विशाल जनसमूह को देखकर,
करबद्ध हो मैं स्तब्ध रह गया,
ज्यों कृष्ण कोई विराट रूप में,
चाटने वो सब दिशाएं, फैल गया,
इस विशिष्‍ट सोच को सोच कर,
दिल और द्रवित हो गया,
लगता है ज्यों भगवान से साक्षात्कार हो गया,
दिव्य सी दृष्टी हुई,
और तृप्ति भी मिली,
कैसे करू धन्यवाद मनमोहन ऐंड कंपनी को,
जो मुझे दिव्य दर्शन हो गया|

Friday, June 17, 2011

यह पहली जीत ही है

आग बरसी-पानी बरसा और आँधी तूफान आया,
बाबा तेरी तपस्या मे ये विघ्न मनमोहन नाम इंद्र लाया,
बाबा यह तो प्रथम चरण है,
तपस्या का तो प्रथम वरण है,
अभी तो कई चरण बचे है,
कई सोपान गढ्ने बचे है,
अगला चरण और दुष्कर होगा,
सोनिया सी अपसराए होंगी,
मदिरा का घाट लाती होंगी,
तुझको विचलित होना ना होगा,
हमारे लिए चलना होगा,
तुम सोपान के लिए चलोगे,
हम जो हो सकेगा सो करेंगे,
विश्वास हो तो आगे बढ़ना,
एक दिन जनता भी उठेगी,
लपटो मे राहुल को खींच लेगी,
जो के जीवन को ना पूछे,
वह यहाँ का पुत्र-पुत्री कैसे?
बाबा तुम फिर फिर आगे बढ़ना,
ये इंद्र कभी तो रुकेगा,
एक दिन शक्ति क्षीण होगी,
सत्ता का मद चूर होगा,
और वो चरण की धूल होगा,
के जब सब धू-धू कर जलेगा,
कभी तो पावन दिन पसरेगा,
बाबा तुम विश्वास रखना ,
ये तपस्या पूर्ण होगी,
भ्रष्टाचार का दानव भी मरेगा,
इंद्र भी सुख चैन देगा,
बाबा तुम ना अटकना, बाबा तुम ना भटकना.

Tuesday, December 28, 2010

बंधन

इक खुबसूरत सी पतंग पर उड़ता हुआ मेरा दिल,
झूम जाना चाहता है डोर के मुकाबिल,
छु कर आकाश को फिर छोड़ दूँ डोर को,
फिर सोचता है,
लूट जाने के डर से,
छोड़ने को छोड़ने के विचार को,
फिर सोचता हूँ छोड़ूगा नहीं, तो पाउँगा क्या?
छोड़ूगा नहीं, तो उड़ पाउँगा क्या?
इस उन्मुक्त गगन को नाप भी क्या पाउँगा?,
बादलों के पार भी जा नहीं पाउँगा,
सोच के घोड़ो को दौड़ा नहीं पाउँगा,
फिर इक मुसाफिर होने के नाते,
छुट जाने और छोड़े जाने के भय से,
मुझे मुक्त होना ही होगा,
मुझे इस गगन में स्वयं को खोजना ही होगा,
आकाश हो या पताल, मुझे स्वयं को खोजना ही होगा,
कर्म मेरा ही होगा, और भविष्य मुझे ही जोड़ना होगा,
इस डोर के बंधन को अब तोडना ही होगा,
उन्मुक्त आकाश में अब उड़ना ही होगा.

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